Wednesday, November 28, 2018

कुंठित मानसिकता


बाहुबली सिनेमा का एक दृश्य जीसमे बाहुबली को राजद्रोह के आरोप में राजगृह से निकल दिया है और वह अपनी पत्नी के साथ पास ही के गाँव मे जाकर रहता है। वहाँ पर भी बाहुबली अपने कुशल नेतृत्व के कारण लोगो का नेता बन जाता हैं. उसे लोगो के बीच देखकर उसकी कार्यशैली देखकर बिज्जलदेव भल्लालदेव से कहता है "अगर यह जीवित रहा तो जहाँ भी रहेगा महाराज बनकर रहेगा".

यह भले ही एक सिनेमा का सीन होगा लेकिन कही न कही वास्तविकता दर्शाता है. बिज्जलदेव जैसी विकृत मानसिकता के लोग हर जगह देखे जा सकते है जिन्हें किसीकी ईमानदारी या नेतृत्व मान्य नहीं होता फिर चाहे वह व्यक्ति कितना भी प्रभावी और विद्वान हो. यह बिज्जलदेव जैसी ही मानसिकता होती है जो खुद का अस्तित्व बचाने के लिए हर वक्त कोई न कोई षडयन्त्र रचता रहता है. उसी षडयंत्रो की बदौलत वह विकृत मानसिकता अच्छे से अच्छे व्यक्ति का निर्मम अंत कर देती है फिर चाहे वह अंत शारीरिक हो या मानसिक...! वक्त रहते ऐसी कुंठित मानसिकता का सिर कुचलना चाहिए वरना इसका नुकसान समाज को भुगतना पड़ता है.

एम जे

#रोहित_वेमुला कि शहादत हमारे लिये एक सबक हो....!

#रोहित_वेमुला कि शहादत हमारे लिये एक सबक हो....!

....आज मैं सारे भारत को #रोहित कि शहादत पर अक्रोशीत होता देख रहा हुँ। एक तरफ गर्व हो रहा है के हमारे भाई कि शहादत पर सारा देश एक आवाज में उठ खडा हुआ है। और दुसरी तरफ यह सोच मन में एक सवाल उठ रहा है के "काश यही आक्रोश 15 दिन पहले अगर शुरू हुवा होता तो आज #रोहित हमारे बीच होता और ऊन पांच शोध विद्यार्थियों को हम सब पर गर्व हुआ होता के उनके इस #जातीवाद के युद्ध में सारे भारत ने एक होकर आवाज उठायी है। और निश्चितही उनके इस युद्ध मे विजय ना सिर्फ उनकी होती बल्की बाबासाहेब आंबेडकर के विचारोकी होती।

लेकिन दुःख ईस बात का है के हमारी संवेदनाये हमारे किसी एक कि बली दिये बिना जागृत नही होती। हम तब तक घरो में बैठकर उस विषय पर गंभीर नही होते जब तक कि समस्या काबू से बाहर चली जाये। #हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के ऊन पांच निष्कासित विद्यार्थियों के साथ भी यही कुछ हुआ है। पिछले 4 महिनोसे वह बच्चे ईस जातीवादी व्यवस्था से अकेले लढ रहे थे। उनकी यह लढाई तब अपनी चरम सीमा वर पहुंची जब ऊस भारतीय जनता पार्टी के बंडारू दत्तात्रेय इस केंद्रीय मंत्री ने MHRD को पत्र लिख कर इन शोध विद्यार्थियों वर जातीवादी और देश विरोधी गतीविधिया चलाने का गंभीर आरोप लगाया और इसके चलते, 3 जनवरी को उन पांच विद्यार्थियों का समान उनके कमरे से बाहेर फेंक दिया गया। लेकिन फिर भी वह बच्चे बाबासाहेब के विचारो और प्रेरणा लेकर लढणे के लिये तय्यार रहे। सबुत इसी बात का है कि रोहित अपने कमरे से बाहर आते समय भी बाबासाहेब कि प्रतिमा हाथ मी लेकर बाहर आया।

पिछले 16 दिनोसे वह लडके कडाके कि थंड में विश्वविद्यालय के खुले मी सो रहे थे। पिछले 16 दिनोसे वह लोंग मदत कि गुहार लगाते रहे, कुछ लोगोने सुना और कुछ लोगोने नही। और आखिरकार ईस #जातीवादी व्यवस्था ने रोहित के रूप मी और एक बलि लि...

यह सब जब हो रहा था, हम सब इस विषय पर कभी इतने संवेदनशील नही रहे जितने कि आज दिख रहे है। आज सारे देश में जिस तरह हमारे सभी समाज कि प्रतिक्रियाये देख रहा हुँ तो ऐसा लग रहा है के हमारी ताकत का दुनिया में कोई मुकाबला नहि। अगर हम इसी तरह एक होकर इस व्यवस्था के खिलाफ खडे रहे तो निश्चितही हम व्यवस्था परिवर्तन कर सकते है। लेकिन दुःख इस बात का है के हम वक्त रहते अपनी संवेदनाये और अपनी एकता का सबुत नही देते।

दोस्तो, रोहित कि मौत हम सबके लिये एक सबक हो ऐसा मै सोचता हुँ। आज रोहित शहीद हुवा है कल और कोई रोहित कि बली यह व्यवस्था मांगेगि। कल फिर किसी जगह हमारे भाई बहनो को नंगा किया जाएगा, कल फिर रोहित हमारे बीच से चला जायेगा। यह व्यवस्था हमारी ताकत को जाणती और समझती है। इसे यह भी पता है कि बाबासाहेब आंबेडकर को मानणे वाला मारणे और मरने के लिये हमेशा तत्पर रहता है। और इसीलिए हम संगठित ना रहे इसलिये निरंतर षडयंत्र करती रहती है।

हम अगर अपनी संवेदनाये और ताकत वक्त रहते दिखायेंगे तभी काळ को फिरसे किसी रोहित कि बलि नही जायेगी। अगर हम ऐसा नही करते है तो इतिहास हमे कभी माफ नही करेगा।।।

जय भीम।।    जय भीम ।।      जय भीम

आपका

Adv महेंद्र जाधव

The greatness of indian democracy

The greatness of indian democracy can be seen in the recent past issues wherein the farmers started their long march from nasik to mumbai and made the government to accept their demands. Whereas similar protest was carried out in Syria long ago wherein one young boy was killed in retaliation. That killing resulted in mass movement which lately turned out to be one of the worst genocides if human race between government and common people. This is where India stands tall as compared to other countries. Indian democracy and indian Constitution is such a blend of Rights and duties provided to citizens and government, where every individual is allowed to speak and raise his voice against the state and in case the voices raised by masses, the government is bound to agree to the demands of people. Isn't it unique feature.?

M.J.

2018-19 के चुनाव

यदि उन्हें लगता है कि 2018-19 के चुनावों में उन्हें हराया जा सकता है, तो देश के लोगोका ध्यान बटाने के लिए उनकी रणनीति नीचे दिए गए संभावित एजेंडा / रणनीतियों पर निर्धारित हो सकती है.

1. धर्म के नामपर देशभर में विकृत वातावरण निर्माण करना
2.पाकिस्तान के साथ के साथ युद्ध का वातावरण निर्माण करना या फिर सीधा युद्ध
3.चीन के साथ युद्ध शुरू करने का वातावरण निर्माण करना
4.राम मंदिर निर्माण तत्काल रूप से शुरू करना/ऐसा वातावरण निर्माण करना
5. काले धन को वापस लाने का प्रयास
6. कॉर्पोरेट व्यक्तियों जैसे कि विजय माल्या, नीरव मोदी को अरेस्ट करना,
7.देश के बड़े बैंको को दिवालिया घोषित करने का वातावरण निर्माण करना ताकि हर आम आदमी अपने पैसे बचाने के काम मे उलझ जाए.

तैयार रहो ... मंच अच्छी तरह से सज चुका है ... उलटी गिनती शुरू की लेनिन प्रतिमा का विध्वंस करके उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है..!

एम जे

The Constitution Awareness Campaign...

The Constitution Awareness Campaign...

The river is very small at the place of its origin,but as it flows ahead it goes on becoming wider and wider so much so that in the end the ships of any big size keep on voyaging in it. This applies to the conditions of many other things. It means the actions many times make a small beginning but in course of time they grow in a huge way and the people rarely think or imagine of the growth in a huge way and rarely think or imagine of their small beginning.

For me The Nationwide Indian Constitution Awareness Campaign is exactly as d river is...!though the campaign has begun on a smaller scale and people may not have noticed its importance. As the time is passing and this campaign is garnering the momentum, a day shall come in the coming future when the world will take notice of this campaign..! Because this campaign is not for gaining money,name,fame or in glorifying any leader...this campaign is for spreading liberty equality fraternity and justice...this campaign is to enlight masses on their rights...this campaign is dedicated for THE GREATEST CONSTITUTION OF THE UNIVERSE...!

Adv Mahendra Jadhav

राजिकय सत्ता चाहिए..!

राजिकय सत्ता चाहिए, राजकीय सत्ता चाहिए..तभी सब अत्याचार बंद होंगे यह सोचना पूर्णतः मूर्खता है ऐसा मैं मानता हूँ. हमने बुद्ध,बाबासाहेब के आंदोलन से न कुछ सीखा है और न ही कुछ सीखना चाहते है यह सीधे तौर पर दिख रहा है. बौद्धों की ऐतिहासिक धरोहर इतनी वैभवशाली और कीर्तियो से भरी पड़ी होने के बावजूद वर्तमान में हालात कुछ ठीक नही दिखते. जिस तरह उन्हें हर क्षेत्र में उपेक्षित किया जा रहा और जिस तरह वह अपने आपको आंदोलन में सक्रिय रखते है, जिस तरह हजारो संघटन होने के बावजूद अत्याचार कम नही हो रहे है, और साथ ही अंतर्विरोध अपने चरमसीमा पर पहुंच चुका है. ईसे देखते हुवे हमे निश्चत ही स्वपरिक्षण करने की जरूरत है.  सिक्खों के पास कौनसी राजकीय सत्ता है? मुसलमानों के पास कौनसी राजकीय सत्ता है?ईसाईयों के पास कौनसे राज्य है जिनमे वह राजकीय क्षेत्र में सक्रिय है? जैनो की कौनसी पार्टी राजनीति में ताकतवर है? तो फिर इन सभी अल्पसंख्यांको पास ऐसा क्या है जो वह राजनीति में सीधे तौर पर ना होकर भी एक शक्तिशाली अल्पसंख्यांको की तरह देश के हर कोने में, हर क्षेत्र में ताकतवर है और उनपर किसी भी तरह के अन्याय अत्याचार होते नही दिखते? नीचे दिए गये क्षेत्रो में वह एकसंघ है ऐसा मैं मानता हूँ.

1.सामाजिक और धार्मिक एकता
2.आर्थिक सक्षमता
3.स्वावलंबिता
4.हम श्रेष्ठ है यह भावना
5.धार्मिक विषयो में एकसंघता
6.राजकीय क्षेत्र में एकमत
7.समाज के हर तबके को आर्थिक सहायता करके उनकी स्थिति को ऊपर उठने की इच्छा और निश्चित कार्यक्रम.

ऐसे बोहोत से कारण है जिनकी वजह से बौद्धों को छोड़ बाकी अल्पसंख्यांक अपनी एक जगह बनाकर देश मे जी रहे है.यह बात सच है के जिस तेजी से हमने हर क्षेत्र में प्रगति की हैं उसकी दुनिया मे कोई मिसाल नही है लेकिन हमें इस बात को भी स्वीकार करना पड़ेगा के धार्मिक और राजकीय स्थिति उतनी ही गंभीर है . यह कहना के सिर्फ राजनीतिक ताकत ही सब समस्याओ का हल है गलत होगा. क्योंकि सामाजिक एकता और एकसंघता ही राजनीति तय करती है यह बात जब तक हमे समझेगी नही तबतक हम ऐसे ही अपने आपमें और अपने दुश्मनों से और अपने आपसे लड़ते रहेंगे, जानें जाती रहेंगी, आंदोलन होते रहेंगे, मोर्चे निकले जाएंगे और आखिर में शाम को घर मे बैठ कर आंदोलन के ऊपर हमारी प्रतिक्रियाएं देने के अलावा ओर कुछ हाथ मे नही रहेगा.

एम जे

आंदोलन जारी रहना चाहिए...!

आंदोलन जारी रहना चाहिए...!

जीवन मे कोई निर्णय लेना बोहोत कठिन होता है फिर चाहे वह वैयक्तिक निर्णय हो या सामाजिक. खासकर तब जब आप किसी संगठन में काम करते हो. निर्णय लेना और भी मुश्किल तब होता है जब आप संगठन में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है, संगठन की पहचान होते हैं… क्योंकि तब आपका निर्णय पूरे संगठन पर लागू होता है, उसमे काम करने वाले सारे कार्यकर्ताओ को मानना पड़ता है और इसकी वजह से कोई निर्णय लेने से पहले हमें उन सभी कार्यकर्ताओं के त्याग,समर्पण, बलिदान को मद्देनजर रखते हुवे ही कोई निर्णय लेना चाहिए ऐसा मैं मानता हूँ. निर्णय लेने से पहले आपको बोहोत सारी बातोंका ध्यान रखना पड़ता है, कार्यकर्ता क्या सोच रहा है, वह क्या चाहता है आंदोलन के प्रति और दल के प्रति…! मैंने हमेशा से कोई भी निर्णय लेने से पहले इन बातों का तहेदिल से ध्यान रखने की कोशिश की हैं और करता रहूंगा.

पिछले कुछ दिनोसे समता सैनिक दल दक्षिण भाग में जो उथलपुथल चल रही थी,उसका इन फोटोज ने कुछ हद्द तक जवाब दे दिया है ऐसा मैं समझता हूँ. कोई सैनिक या कार्यकर्ता खड़ा करने में, उसे बचाये रखने में कितनी मेहनत लगती है यह हम सभी को अच्छेसे पता है. करीब 4 से 5 साल से हम यहाँ समता सैनिक दल को पूरे दक्षिण भारत मे पहुंचने का काम कर रहे है. इस प्रयास में कई अच्छे लोग,कार्यकर्ता मिले जिन्होंने आंबेडकरी आंदोलन को दक्षिण भारत मे फैलाने हेतु पूरे जी जान से मेरा साथ निभाया और निभाते रहेंगे. जैसे हर संगठन में एक पड़ाव आता है ठीक वैसे ही यहाँ भी दल में कुछ अनैतिक लोगोके आनेसे दल की गरिमा और प्रतिष्ठा साख पर आ चुकी है. दल को बढ़ाने में जिन कार्यकर्ताओ ने अपना सर्वस्व अर्पण किया है उन्हें अपने आंखों के सामने समता सैनिक की गरिमा बचाने का बड़ा सवाल खड़ा हो चुका है. और सभी की यही मानसिकता बन चुकी थी के अब हम "उन लोगोके साथ काम नही नही सकते और हमे एक और नया संगठन बनाना ही पड़ेगा". इसके मद्दे नजर चूंकि मैं दल का सबसे पुराना सैनिक हूँ, सभी ने मुझसे चर्चा की और आगे की रणनीति और दल को दुबारा खड़ा करने का आग्रह किया. इस विषम परिस्थिति में मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल जो खड़ा था वह यह के “क्या मुझे फिरसे कोई संगठन खड़ा करना चाहिए?” क्या फिर से एक नई शुरुवात करनी चाहिए, फिरसे निर्माण की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए…? दिमाग मे सिर्फ कार्यकर्ताओ को बांधे रखने की बात है,उन्हें न तो दल से दूर किया जा सकता था और न ही कोई नया संगठन खड़ा करने की मंशा मेरे दिलो-दिमाग में थी. एक तरफ दल के कार्यकर्ताओ को साथ मे रखना, उन्हें फिर से दिशाभूल होनेसे बचाने का जिम्मा और दूसरी तरफ मेरा वैयक्तिक जीवन,मेरा कैरियर,Phd की पढ़ाई और घर की जिम्मेदारी… मैं अब इस परिस्थिति में नही था के कुछ नया और अलग किया जाए, फिरसे अपनी ज़िंदगी के बहुमूल्य साल/समय निर्माण की प्रक्रिया में व्यर्थ करू. करियर और परिवार को समय देना इस वक्त मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है. इन सभी चीजों को दृष्टि में रखकर मुझे ऐसा लगा के कोई नया दल बनाने से अच्छा है, जो संगठन पहले से आंदोलन में सक्रिय है, और जिस संगठन में मैं पहले काम कर चुका हूँ, उनके साथ "सामंजस्य(कोआर्डिनेशन) से काम करना" इस समय में सबसे बेहतर उपाय होगा. जिससे मैं कार्यकताओ में जो निराशभरा वातावरण है उसे शांत कर सकता हूँ,  कार्यकर्ताओ को दिशाभूल होने से बचा सकूँगा और एक नया दल बनने से रह जायेगा. बाबासाहेब अम्बेडकर के सामने कोई नया धर्म देना चाहिए या अस्तित्व में जो है उनमें से कोई एक धर्म चुनना चाहिए यह बात मेरे दिमाग मे घूम रही थी. जिस तरह बाबासाहेब ने जो अस्तित्व में है, औऱ पूर्णतः भारीतय धर्म है उसे चुना, मेरा यह निणर्य भी उनके इसी निणर्य से प्रेरित हैं..! कोई नया दल खड़ा करने और यहाँके कार्यकर्ता उसे आगे ले जा सकेंगे या नही? उसे बचा सकेंगे या नही इन सवालों ने मुझे बोहित दिनोंतक आहत किया है. अंततः मैन जो निर्णय लिया है वह उन सभी कार्यकर्ताओं के भविष्य औऱ यहाँकी परिस्तिथियों को मद्देनजर रखते हुवे लिया हैं. किसीका नेतृत्व मान्य करने के लिए नही..! मेरे लिए बुद्ध और बाबासाहेब आम्बेडकर यह प्रथम और अंतिम प्रेरणा है और रहेंगे..!

यह समय कोई और संगठन खड़ा करने का नही है यह मैं भली भाँति समझता था और इसीलिए मुझे यह विकल्प अधिक ठीक लगा. सिर्फ यह सोचकर आदरणीय मार्शल विमलसूर्य चिमनकर सर और उनकी टीम को "हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड" में डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर जयंती के उपलक्ष्य में आमंत्रित किया गया था. इसी दौरान उनके साथ जो चर्चा हुई वह आशावादी चर्चा रही जिसमे इस समय अलग अलग काम करना आंदोलन के किये ठीक नही होगा, और इसलिए हम सभी को साथ मे करना पड़ेगा इस विषय पर और बाकी बोहोत सारे विषयो ओर करीब दिन भर चर्चा हुई. हम सभी एक दूसरे के साथ "सामन्जस्य (Coordination)के साथ" काम करने की इच्छा जताई और क्योंकि हमारे बीच कोई द्वेष नही था, दल को आगे बढ़ाने हेतु, हैदराबाद यह दक्षिण का केंद्र हो, सभी लोग एक साथ काम कैसे कर सकते है, समता सैनिक दल के एकीकरण पर भी आशावादी चर्चा हुई.

यहाँ जितने कार्यकर्ता मेरे साथ काम करते है उनका एक ही आग्रह था के "सर अगर आप साथ नही  है, हमारे आगे नही है तो हम किसी भी दल में काम नही करंगे" मैं अपने कार्यकर्ताओं का टूटता हौसला नही देख सकता था और न ही उन्हें किसी और संगठन में शामिल होने की अनुमति दे सकता था. इससे बेहतर यही है के जो पहले से अस्तित्व में है उनके साथ यहाँ के कार्यकर्ताओं को मिलाया जाए और आगे का सफर  किया जाए. यही सोचकर आदरणीय चिमनकर सर को यहां एक कार्यक्रम में बुलाया गया और बाकी चर्चाएं हुई. अगर मैं चाहता तो और एक दल खड़ा करके उसका मुखिया बन सकता था, लेकिन नेता, मुखिया बनने की इच्छा न तो पहले मेरे दिल मे थी, न है औऱ ना कभी होगी. मैन हमेशा से पूरी ईमानदारी से समता सैनिक दल को देश के कोने कोने में कैसे पहुंचाया जा सकता है यही सोच रखी थी और रहेगी.

मुझे, मेरे काम को, चारित्र्य को औऱ आंबेडकरी आंदोलन के प्रति मेरी निष्ठा को जो लोग पहचानते है, वह लोग यह भी जानते है के मैंने यह निर्णय किन परिस्थितियों की वजह से लिया है. वह लोग मेरे इस निर्णय को सही ठहराते है या गलत मैं उनके विवेक पर छोड़ता हूँ. मेरे इस निर्णय का लोग कोई और अर्थ न निकाले तो बेहतर होगा. एक विजन को लेकर काम करने की सोच रखकर आदरणीय विमलसूर्य चिमनकर सर के साथ यहां की टीम ने हाथ मिलाया है. अभी तक पूरी तरह से विलनिकरन का कोई सवाल नही है, हम एक दूसरे के साथ काम करेंगे. यहाँ के मेरे साथ काम करने वाले जितने भी कार्यकर्ता आदरणीय चिमनकर सर के साथ काम करने के मेरे सुझाव को मान्य किया है मैं उनका तहेदिल से आभारी हूं, और साथ ही आदरणीय चिमनकर सर का भी जिन्होंने कोई भी शर्त न रखते हुए पूरे दिल से दक्षिण में दल मजबूत करने की बात कही. बाकी दल एकसाथ आएंगे या नही इसपर निरन्तर काम चलता रहेगा. दोस्तो, आंदोलन को बढ़ाने के लिए सिर्फ एक ही शर्त होनी चाहिए वह है डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को विन्रम होना और पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी का वहन करना. नेतृत्व कोई भी हो, वह शास्वत नही है, शास्वत है बुद्ध और आंबेडकरी विचार, उन्होंने शुरू की हुई लड़ाई.. हम सब निमित्त मात्र है और कुछ नही…!

आपका,

Adv महेंद्र जाधव