Wednesday, November 28, 2018

The Constitution Awareness Campaign...

The Constitution Awareness Campaign...

The river is very small at the place of its origin,but as it flows ahead it goes on becoming wider and wider so much so that in the end the ships of any big size keep on voyaging in it. This applies to the conditions of many other things. It means the actions many times make a small beginning but in course of time they grow in a huge way and the people rarely think or imagine of the growth in a huge way and rarely think or imagine of their small beginning.

For me The Nationwide Indian Constitution Awareness Campaign is exactly as d river is...!though the campaign has begun on a smaller scale and people may not have noticed its importance. As the time is passing and this campaign is garnering the momentum, a day shall come in the coming future when the world will take notice of this campaign..! Because this campaign is not for gaining money,name,fame or in glorifying any leader...this campaign is for spreading liberty equality fraternity and justice...this campaign is to enlight masses on their rights...this campaign is dedicated for THE GREATEST CONSTITUTION OF THE UNIVERSE...!

Adv Mahendra Jadhav

राजिकय सत्ता चाहिए..!

राजिकय सत्ता चाहिए, राजकीय सत्ता चाहिए..तभी सब अत्याचार बंद होंगे यह सोचना पूर्णतः मूर्खता है ऐसा मैं मानता हूँ. हमने बुद्ध,बाबासाहेब के आंदोलन से न कुछ सीखा है और न ही कुछ सीखना चाहते है यह सीधे तौर पर दिख रहा है. बौद्धों की ऐतिहासिक धरोहर इतनी वैभवशाली और कीर्तियो से भरी पड़ी होने के बावजूद वर्तमान में हालात कुछ ठीक नही दिखते. जिस तरह उन्हें हर क्षेत्र में उपेक्षित किया जा रहा और जिस तरह वह अपने आपको आंदोलन में सक्रिय रखते है, जिस तरह हजारो संघटन होने के बावजूद अत्याचार कम नही हो रहे है, और साथ ही अंतर्विरोध अपने चरमसीमा पर पहुंच चुका है. ईसे देखते हुवे हमे निश्चत ही स्वपरिक्षण करने की जरूरत है.  सिक्खों के पास कौनसी राजकीय सत्ता है? मुसलमानों के पास कौनसी राजकीय सत्ता है?ईसाईयों के पास कौनसे राज्य है जिनमे वह राजकीय क्षेत्र में सक्रिय है? जैनो की कौनसी पार्टी राजनीति में ताकतवर है? तो फिर इन सभी अल्पसंख्यांको पास ऐसा क्या है जो वह राजनीति में सीधे तौर पर ना होकर भी एक शक्तिशाली अल्पसंख्यांको की तरह देश के हर कोने में, हर क्षेत्र में ताकतवर है और उनपर किसी भी तरह के अन्याय अत्याचार होते नही दिखते? नीचे दिए गये क्षेत्रो में वह एकसंघ है ऐसा मैं मानता हूँ.

1.सामाजिक और धार्मिक एकता
2.आर्थिक सक्षमता
3.स्वावलंबिता
4.हम श्रेष्ठ है यह भावना
5.धार्मिक विषयो में एकसंघता
6.राजकीय क्षेत्र में एकमत
7.समाज के हर तबके को आर्थिक सहायता करके उनकी स्थिति को ऊपर उठने की इच्छा और निश्चित कार्यक्रम.

ऐसे बोहोत से कारण है जिनकी वजह से बौद्धों को छोड़ बाकी अल्पसंख्यांक अपनी एक जगह बनाकर देश मे जी रहे है.यह बात सच है के जिस तेजी से हमने हर क्षेत्र में प्रगति की हैं उसकी दुनिया मे कोई मिसाल नही है लेकिन हमें इस बात को भी स्वीकार करना पड़ेगा के धार्मिक और राजकीय स्थिति उतनी ही गंभीर है . यह कहना के सिर्फ राजनीतिक ताकत ही सब समस्याओ का हल है गलत होगा. क्योंकि सामाजिक एकता और एकसंघता ही राजनीति तय करती है यह बात जब तक हमे समझेगी नही तबतक हम ऐसे ही अपने आपमें और अपने दुश्मनों से और अपने आपसे लड़ते रहेंगे, जानें जाती रहेंगी, आंदोलन होते रहेंगे, मोर्चे निकले जाएंगे और आखिर में शाम को घर मे बैठ कर आंदोलन के ऊपर हमारी प्रतिक्रियाएं देने के अलावा ओर कुछ हाथ मे नही रहेगा.

एम जे

आंदोलन जारी रहना चाहिए...!

आंदोलन जारी रहना चाहिए...!

जीवन मे कोई निर्णय लेना बोहोत कठिन होता है फिर चाहे वह वैयक्तिक निर्णय हो या सामाजिक. खासकर तब जब आप किसी संगठन में काम करते हो. निर्णय लेना और भी मुश्किल तब होता है जब आप संगठन में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है, संगठन की पहचान होते हैं… क्योंकि तब आपका निर्णय पूरे संगठन पर लागू होता है, उसमे काम करने वाले सारे कार्यकर्ताओ को मानना पड़ता है और इसकी वजह से कोई निर्णय लेने से पहले हमें उन सभी कार्यकर्ताओं के त्याग,समर्पण, बलिदान को मद्देनजर रखते हुवे ही कोई निर्णय लेना चाहिए ऐसा मैं मानता हूँ. निर्णय लेने से पहले आपको बोहोत सारी बातोंका ध्यान रखना पड़ता है, कार्यकर्ता क्या सोच रहा है, वह क्या चाहता है आंदोलन के प्रति और दल के प्रति…! मैंने हमेशा से कोई भी निर्णय लेने से पहले इन बातों का तहेदिल से ध्यान रखने की कोशिश की हैं और करता रहूंगा.

पिछले कुछ दिनोसे समता सैनिक दल दक्षिण भाग में जो उथलपुथल चल रही थी,उसका इन फोटोज ने कुछ हद्द तक जवाब दे दिया है ऐसा मैं समझता हूँ. कोई सैनिक या कार्यकर्ता खड़ा करने में, उसे बचाये रखने में कितनी मेहनत लगती है यह हम सभी को अच्छेसे पता है. करीब 4 से 5 साल से हम यहाँ समता सैनिक दल को पूरे दक्षिण भारत मे पहुंचने का काम कर रहे है. इस प्रयास में कई अच्छे लोग,कार्यकर्ता मिले जिन्होंने आंबेडकरी आंदोलन को दक्षिण भारत मे फैलाने हेतु पूरे जी जान से मेरा साथ निभाया और निभाते रहेंगे. जैसे हर संगठन में एक पड़ाव आता है ठीक वैसे ही यहाँ भी दल में कुछ अनैतिक लोगोके आनेसे दल की गरिमा और प्रतिष्ठा साख पर आ चुकी है. दल को बढ़ाने में जिन कार्यकर्ताओ ने अपना सर्वस्व अर्पण किया है उन्हें अपने आंखों के सामने समता सैनिक की गरिमा बचाने का बड़ा सवाल खड़ा हो चुका है. और सभी की यही मानसिकता बन चुकी थी के अब हम "उन लोगोके साथ काम नही नही सकते और हमे एक और नया संगठन बनाना ही पड़ेगा". इसके मद्दे नजर चूंकि मैं दल का सबसे पुराना सैनिक हूँ, सभी ने मुझसे चर्चा की और आगे की रणनीति और दल को दुबारा खड़ा करने का आग्रह किया. इस विषम परिस्थिति में मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल जो खड़ा था वह यह के “क्या मुझे फिरसे कोई संगठन खड़ा करना चाहिए?” क्या फिर से एक नई शुरुवात करनी चाहिए, फिरसे निर्माण की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए…? दिमाग मे सिर्फ कार्यकर्ताओ को बांधे रखने की बात है,उन्हें न तो दल से दूर किया जा सकता था और न ही कोई नया संगठन खड़ा करने की मंशा मेरे दिलो-दिमाग में थी. एक तरफ दल के कार्यकर्ताओ को साथ मे रखना, उन्हें फिर से दिशाभूल होनेसे बचाने का जिम्मा और दूसरी तरफ मेरा वैयक्तिक जीवन,मेरा कैरियर,Phd की पढ़ाई और घर की जिम्मेदारी… मैं अब इस परिस्थिति में नही था के कुछ नया और अलग किया जाए, फिरसे अपनी ज़िंदगी के बहुमूल्य साल/समय निर्माण की प्रक्रिया में व्यर्थ करू. करियर और परिवार को समय देना इस वक्त मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है. इन सभी चीजों को दृष्टि में रखकर मुझे ऐसा लगा के कोई नया दल बनाने से अच्छा है, जो संगठन पहले से आंदोलन में सक्रिय है, और जिस संगठन में मैं पहले काम कर चुका हूँ, उनके साथ "सामंजस्य(कोआर्डिनेशन) से काम करना" इस समय में सबसे बेहतर उपाय होगा. जिससे मैं कार्यकताओ में जो निराशभरा वातावरण है उसे शांत कर सकता हूँ,  कार्यकर्ताओ को दिशाभूल होने से बचा सकूँगा और एक नया दल बनने से रह जायेगा. बाबासाहेब अम्बेडकर के सामने कोई नया धर्म देना चाहिए या अस्तित्व में जो है उनमें से कोई एक धर्म चुनना चाहिए यह बात मेरे दिमाग मे घूम रही थी. जिस तरह बाबासाहेब ने जो अस्तित्व में है, औऱ पूर्णतः भारीतय धर्म है उसे चुना, मेरा यह निणर्य भी उनके इसी निणर्य से प्रेरित हैं..! कोई नया दल खड़ा करने और यहाँके कार्यकर्ता उसे आगे ले जा सकेंगे या नही? उसे बचा सकेंगे या नही इन सवालों ने मुझे बोहित दिनोंतक आहत किया है. अंततः मैन जो निर्णय लिया है वह उन सभी कार्यकर्ताओं के भविष्य औऱ यहाँकी परिस्तिथियों को मद्देनजर रखते हुवे लिया हैं. किसीका नेतृत्व मान्य करने के लिए नही..! मेरे लिए बुद्ध और बाबासाहेब आम्बेडकर यह प्रथम और अंतिम प्रेरणा है और रहेंगे..!

यह समय कोई और संगठन खड़ा करने का नही है यह मैं भली भाँति समझता था और इसीलिए मुझे यह विकल्प अधिक ठीक लगा. सिर्फ यह सोचकर आदरणीय मार्शल विमलसूर्य चिमनकर सर और उनकी टीम को "हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड" में डॉ. बाबासाहेब आम्बेडकर जयंती के उपलक्ष्य में आमंत्रित किया गया था. इसी दौरान उनके साथ जो चर्चा हुई वह आशावादी चर्चा रही जिसमे इस समय अलग अलग काम करना आंदोलन के किये ठीक नही होगा, और इसलिए हम सभी को साथ मे करना पड़ेगा इस विषय पर और बाकी बोहोत सारे विषयो ओर करीब दिन भर चर्चा हुई. हम सभी एक दूसरे के साथ "सामन्जस्य (Coordination)के साथ" काम करने की इच्छा जताई और क्योंकि हमारे बीच कोई द्वेष नही था, दल को आगे बढ़ाने हेतु, हैदराबाद यह दक्षिण का केंद्र हो, सभी लोग एक साथ काम कैसे कर सकते है, समता सैनिक दल के एकीकरण पर भी आशावादी चर्चा हुई.

यहाँ जितने कार्यकर्ता मेरे साथ काम करते है उनका एक ही आग्रह था के "सर अगर आप साथ नही  है, हमारे आगे नही है तो हम किसी भी दल में काम नही करंगे" मैं अपने कार्यकर्ताओं का टूटता हौसला नही देख सकता था और न ही उन्हें किसी और संगठन में शामिल होने की अनुमति दे सकता था. इससे बेहतर यही है के जो पहले से अस्तित्व में है उनके साथ यहाँ के कार्यकर्ताओं को मिलाया जाए और आगे का सफर  किया जाए. यही सोचकर आदरणीय चिमनकर सर को यहां एक कार्यक्रम में बुलाया गया और बाकी चर्चाएं हुई. अगर मैं चाहता तो और एक दल खड़ा करके उसका मुखिया बन सकता था, लेकिन नेता, मुखिया बनने की इच्छा न तो पहले मेरे दिल मे थी, न है औऱ ना कभी होगी. मैन हमेशा से पूरी ईमानदारी से समता सैनिक दल को देश के कोने कोने में कैसे पहुंचाया जा सकता है यही सोच रखी थी और रहेगी.

मुझे, मेरे काम को, चारित्र्य को औऱ आंबेडकरी आंदोलन के प्रति मेरी निष्ठा को जो लोग पहचानते है, वह लोग यह भी जानते है के मैंने यह निर्णय किन परिस्थितियों की वजह से लिया है. वह लोग मेरे इस निर्णय को सही ठहराते है या गलत मैं उनके विवेक पर छोड़ता हूँ. मेरे इस निर्णय का लोग कोई और अर्थ न निकाले तो बेहतर होगा. एक विजन को लेकर काम करने की सोच रखकर आदरणीय विमलसूर्य चिमनकर सर के साथ यहां की टीम ने हाथ मिलाया है. अभी तक पूरी तरह से विलनिकरन का कोई सवाल नही है, हम एक दूसरे के साथ काम करेंगे. यहाँ के मेरे साथ काम करने वाले जितने भी कार्यकर्ता आदरणीय चिमनकर सर के साथ काम करने के मेरे सुझाव को मान्य किया है मैं उनका तहेदिल से आभारी हूं, और साथ ही आदरणीय चिमनकर सर का भी जिन्होंने कोई भी शर्त न रखते हुए पूरे दिल से दक्षिण में दल मजबूत करने की बात कही. बाकी दल एकसाथ आएंगे या नही इसपर निरन्तर काम चलता रहेगा. दोस्तो, आंदोलन को बढ़ाने के लिए सिर्फ एक ही शर्त होनी चाहिए वह है डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के विचारों को विन्रम होना और पूरी ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी का वहन करना. नेतृत्व कोई भी हो, वह शास्वत नही है, शास्वत है बुद्ध और आंबेडकरी विचार, उन्होंने शुरू की हुई लड़ाई.. हम सब निमित्त मात्र है और कुछ नही…!

आपका,

Adv महेंद्र जाधव

SC allows running of dance bars in Maharashtra

SC allows running of dance bars in Maharashtra – My View

I saw the news  The Honorable Supreme Court’s verdict allowing the Dance Bar business to run.  In 2005 Maharashtra govt. banned the dance bar business to stop illegal activities and rampant prostituion. Seven years after they were banned, dance bars can again run in Maharashtra with the Supreme Court today upholding a Bombay High Court verdict quashing the state government's order. A bench comprising Chief Justice Altamas Kabir and Justice S S Nijjar also vacated its stay order on implementation of the High Court judgment.

The Maharashtra government had in 2005 brought in an amendment in the Bombay Police Act which was challenged in the High Court by an association representing restaurants and bars.

The High Court in 2006 had quashed the government's decision. The state government had moved the apex court against the High Court's order in the same year. The Supreme Court, while admitting the government's plea, had stayed the High Court's verdict.

In its plea, the state government had contended that prostitution rackets were being run under the garb of beer bars and indecent and vulgar performances, "derogatory to the society" were taking place…

Personally backing up Maharashtra Govt.’s order of banning the dance bas business in the context of INCREASING ILLEGAL SOCIAL ACTIVITIES IN THE SOCIETY. And rampant business of Human Trafficking and Prostitution. The honorable Supreme Court’s judgment will again give wings to human trafficking and prostitution. I have not gone through the full text of the judgment but the very basic idea of any common human being is that such dance bars will certainly provide ways to many illegal activities.  This is the reason why I suppose Maharashtra govt. had banned the dance bar business in 2005.

I am deeply surprised what could have made the honorable Supreme Court to pass such judgment (With due respect to the highest court of India) without considering the social stigma and post effect of such businesses… I strongly believe that Human Trafficking and prostitution will grow more in the state…
What do you say my friends…?

M.J.
16.7.2013.

जमावड़ा

जमावडा निश्चितच आंदोलन उभे करू शकत नाही, पण आंदोलनाची किंवा समोरच्या प्रक्रियेची नांदी जरूर उभी करण्यास मदत करतो. जमावडा उत्सव साजरा करण्या साठी आहे का मग एखादी ऐतिहासिक घटना साजरी करण्या साठी हा फरक जर आपल्या बुद्धीला पटला तर त्या जमावड्याच रूपांतर आंदोलनात करण्यास आपली विद्वात्ता निश्चितच आपण कामी आणू शकतो. जमावडा दोन व्यक्तीचा असो किंवा 2000 लोकांचा फरक निश्चितच पडतो, गरज असते त्या जमावड्याला योग्य दिशा देण्याची.
तथागत बुद्धासमोर बसलेल्या त्या प्रथम शिष्यानीच संघाची निर्मिती झाली आणि धम्म साऱ्या जगात पोचला, टेनिस कोर्ट वर जमा झालेल्या त्यास 4 मित्रांच्या जमावड्यानेच रशियन क्रांती उभी केली, चवदार तलावाचा सत्याग्रह त्याच जमावड्याने उभा केला आणि 14 ऑक्टोबर धम्म क्रांतीत देखील तोच जमावडा होता हे आपण समजले पाहिजे.
समाज एकत्रित होणं हा आनंदाचा भाग आहे त्याला आपण हिनवन कितपत योग्य आहे हे आपल्या विवेकवर अवलंबून आहे, शक्य असेल तर त्या जमावड्यात सामील होऊन एकत्रित असण्याचा, समाजाचा एक अभिन्न भाग असण्याचा आनंद लुटावा.

एम जे

परिवार ही सबकुछ होता है..!

परिवार ही सबकुछ होता है..! परिवार नही तो कुछ भी नही..!

परिवार... माँ, बाप,भाई बहन, पत्नी, बच्चे और अच्छे दोस्त. किसी भी व्यक्ति के जीवन मे इन रिश्तो की एहमियत बहुत ज्यादा होती है ऐसा हम सभी मानते हैं. अगर इनमे से कोई रिश्ता दूर हो, ना हो तो जिंदगी यह ज़िन्दगी नही रहती. अक्सर यह देखा गया है के लाखों कमाने वाले लोगो के पास माँ बाप, अच्छे दोस्त ना होने पर वह कितनी असहनीय ज़िदंगी जीते है. उनके पास पैसा तो बहुत होता है लेकिन उस पैसे का सुख लेनेके लिए उस व्यक्ति के पास कोई नही होता. फेसबुक और उपरी तौर पर तो हजारों दोस्त होते है लेकिन वह जब अपने आप को अकेले में देखता है तो सच कहता हूँ, कोई चीज़ मायने नही रखती.

ज़िन्दगी में सबसे महत्वपूर्ण और सबसे करीबी रिश्ता होता हैं माँ बाप का...माँ बाप अपने बच्चों को पैदा होने से लेकर जबतक वह दुनिया से चले नही जाते तबतक प्यार करते है. बचपन मे बच्चा चाहे हज़ार गलतियां करे लेकिन मा बाप कभी बच्चों को दूर नही करते. उनका गुस्सा भी बच्चों की भलाई के लिए होता है. वह बच्चों की हर ख्वाहिश पूरी हो इसलिए अपना सबकुछ न्योछावर कर देते है. अपनी खुशियां, अपने सपने और अपना बचा हुवा सारा जीवन वह बच्चों के लिए ही जीते है. मैं समझता हूँ के मा बाप का जितना अधिकार अपने बच्चों पर होता है उतना किसीका भी नही होता है और न ही होना चाहिए. क्योंकि उनकी वजह से हम यह दुनिया देख रहे है,उनकी वजह से हम जिंदा है, बच्चा बड़ा होकर चाहे जितनी भी ऊंचाई छू ले वह सिर्फ और सिर्फ उनके मा बाप के त्याग,समर्पण और प्यार का नतीजा होता है ऐसा मैं मानता हूँ. और इसलिए बच्चा चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो वह मा बाप से छोटा ही होता है और होना भी चाहिए. अगर हम गलती करते है तो उन्हें पूरा हक्क है के वह हमें सही रास्ता बताये. ठीक वैसे ही जैसे बचपन मे हम कोई गलती करते थे तब हमें डांटते थे और फिर उससे कई ज्यादा प्यार भी करते थे. लेकिन विडम्बना यह है के बच्चे जैसे ही बड़े होते है,कमाने लगते है,शादी करते है वह अपने बूढ़े मा बाप को भूल जाते है.(अपवाद छोड़कर) बच्चे जैसे जैसे बड़े होने लगते है उन्हें अपने माँ बाप बोझ लगने लगते है,फिर उनकी बातें, उनकी डांट, उनका प्यार सारि बाते बच्चो को ढकोसले लगती है और वह हमेशा कोई न कोई रास्ता ढूंढने लगते है जिससे वह बूढे मा बाप का पीछा छुड़ा सके.

कैसी विडंबना है ना, जिन माँ बाप ने यह ज़िदंगी दी,  अपना खून पसीना एक कर बच्चो को पढ़ाया लिखाया, जिंदगी जीने के काबिल बनाया, अपनी सारी खुशिया और जिंदगी बच्चो के नाम कर दी और वही बच्चे जब बड़े होते है, एक दिन अपने माँ बाप को छोड़कर चले जाते है.वह यह नही सोचते के बुढ़ापे में उनको हमारी जरूरत सबसे ज्यादा होती है,वह यह क्यों नही सोचते के अगर माँ बाप का आशीर्वाद हमारे ऊपर ना हो तो कोई सुख सुख नही होता. हम जब थक कर घर आते है तब माँ की प्यार भरी आवाज "बेटा तक गया होगा ना, रुक मैं तेरे लिए चाय बनाकर लाती हूँ" कहने वाली वह आवाज अगर घर में न गूंजे तो वह घर घर कैसा? बच्चों की पसंद का खाना वह खा सके इसलिए माँ कितने जतन करती हैं. हम यह क्यों भूल जाते है के जब खाने के लिए कुछ नही होता तब मा बाप भूखे रहकर अपने बच्चों का पेट भरते हैं.  अगर घर मे पिताजी का कुर्सी पर बैठ कर न्यूज़ चेंनल में कोई न्यूज़ देखकर यह कहना " बेटे गाड़ी सम्भल कर चलाना देख कैसे वह एक्सीडेंट हुवा है tv पर बात रहे है". उनका हमारे लिए फिक्र करना यह हम कहासे लाये…? बाहर से कुछ लाना हो और बड़ा/छोटा भाई न हो जिसे हम कहे " भाई मेरे गाड़ी में पेट्रोल खत्म हो गया, तेरी गाड़ी आज के लिए ले जाता हूँ" कहना. बहन का हाथ मे चाय का कप लाकर रिटर्न में उसके खर्चे के लिए पैसे पूछना... अगर यह सब घर मे न हो तो कोई घर घर नही होता. कोई सुख यह सुख नही होता ऐसा मैं मानता हूँ. बच्चे आखिर क्यों भूल जाते के परिवार का साथ, परिवार का सुख ही ज़िदंगी की सबसे बड़ी भेंट है. हम यह क्यों भूल जाते है के अगर माँ बाप ने हमें बनाया है तो उनका हमपर हक्क भी उतना ही बनता है, हम यह क्यों भूल जाते है की हमारी ज़िदंगी में जीत हो उसलिये माँ बाप हर रोज हारते थे, हारते रहते है..! उनकी बच्चो से क्या अपेक्षाएं रहती हैं? प्यार के दो शब्द…  फिक्र की दो बातें..! शाम को जब घर आते है तब उनके बेटे/बेटी से सिर्फ यह सुनना के “ माँ/पिताजी, खाना खाया के नही, आओ साथ मे बैठ कर खाते हैं..! एक बाप की सिर्फ यही अपेक्षा रहती है के उसका बेटा/बेटी उसके पास आये और कहे “पिताजी लाइये मैं आपका चश्मा ठीक करके लाता हूँ”. एक माँ की सिर्फ यही आशा रहती हैं के उसका बेटा/बेटी उसके करीब बैठे और उससे दो प्यार की बाते करे. और अगर हम उन्हें यह भी नही दे सकते तो हमारे जीवन का क्या अर्थ हैं…? क्या हासिल करेंगे वह बच्चे जो अपने बूढ़े माँ बाप की सेवा नही कर सकते, उनका सहारा नही बन सकते. क्या जवाब देंगे हम अपने आप को जब हम आईने के सामने खड़े होकर खुद से यह सवाल करेंगे के तुमने अपने परिवार के लिए क्या किया? क्या जवाब होगा हमारे पास जब दोस्त अपनी दोस्ती की दुहाई देंगे और कहेंगे, "साले तू तो हम सबको भूल गया बे..! " क्या जवाब देंगे उन व्यक्तियों को जिन्होंने हमे बड़ा बनाने के लिए कभी ना कभी कुछ न कुछ दिया हो?

अपनी जिंदगी में हम चाहे कितना भी पैसा कमाये, चाहे जितने भी बडे पद पर काम करे, लेकिन मैं समझता हूं के उस success का गर्व हमारे परिवार को, दोस्तो को न हो तो वह success किसी काम की नही. लाख रुपया कमाये लेकिन मा बाप को चार पैसो के कपड़े ना खरीद सके उस कमाई पर लानत होनी चाहिए. अगर वह पद और पैसा हमारे परिवार के चहेरे पर मुस्कान नही ला सकती तो हमे सोचना चाहिए के हम किस दिशा में जा रहे है. क्योंकि हम आज जो कुछ है वह सिर्फ और सिर्फ हमारे माँ बाप के त्याग और समर्पण की वजह से है. और जो बच्चे अपने माँ बाप को भूल जाते है,उन्हें बुढ़ापे पे रोने ओर मजबूर करते है, उनका जीने का सहारा नही बन सकते वह बच्चे किसी के नही हो हो सकते, लानत होनी चाहिए ऐसे बच्चों पर...!

माँ बाप, भाई, बहन, पत्नी, बच्चे और हमेशा साथ देने वाले दोस्त है तो जिंदगी है वरना कुछ नही. कुछ भी नही…!

एम जे

Tuesday, September 18, 2018

Religious Hatred

We have witnessed innumerable losses of lives and properties due to clashes between different religions, sects or groups. If one starts counting them there will be no end. Caste killings, religious sanctions and social boycotts are rampant these days. The so called honor killings(for me they are all caste based hatred and well hatched murders) are seen around us. Couples are been killed in broad day light, lynched inhumanly and paraded naked in many villages at North States.

Apart from this, couple of months ago  in UP and other states left thousands of people homeless. There are thousands of people who are taking shelters in the refugee camps set up by government. There are to be mothers who have had miscarriages, there are mothers who have given births to their child in the refugee camps where their basic needs are barely meeting. When reporters ask them if they want to return to their native places they deny saying that they don't want to lose their family members whoever are alive now. They shiver with the fear of being molested raped and killed.

How many more such cruel acts we have to witness to understand that we should get away from the extreme feelings for the religion, caste and creed? Either be it religion, caste or creed, it gives power to the people who have no humanity. The useless and dumb thinking that the are sitting on top and others are all slaves..! They will make us fight on anything ranging from caste, creed, region or religion. Considering the facts, I strongly believe that there is no future to this country unless we understand that "Religion is for man, man is not for religion" as rightly said by Dr.Babasaheb Ambedkar.

M.J.